Monday, 14 May 2012


जितनी बार भी उजड़ता है, हम बना लेते हैं नया फिर से आशियाँ,
देखते हैं इसके दम को, कब तलक आजमाएगा हमको तूफाँ |

-विशाल

मैं भी एक इंसान हूँ, कोई दीवार तो नहीं, कि
जो भी आया कुछ न कुछ सुना कर चला गया |
-
विशाल

जिन्दगी में बस कुछ दिनों की ही कशमकश बाकी है अब,
कुछ गुजर गयी है, बाकी भी गुजर ही जाएगी धीरे धीरे |

-विशाल

जो अभी से अंधेरों से घबरा गए हैं,
जिनके चेहरे कभी के मुरझा गए हैं,
कह दो उनसे कि ये सच है औ ये होगा,
छटेंगे ये बादल भी जो छा गए हैं |

-विशाल

हम कारवां के साथ रह के भी उससे जुदा रहे,
जैसे कोई शख्स हर दम खुद से खफा रहे |
दूसरों को जानने में खुद को गये हम भूल,
कोशिश करो कि सामने खुद के भी आइना रहे |


-विशाल

किस पर करें भरोसा आज की दुनिया में, पीठ में खंजर मार जाते हैं जो यगाने हैं,
सब कुछ इन्हें दे के भी हार के बैठा हूँ, इनसे तो वो बेहतर जो पूरी तरह बेगाने हैं |

-विशाल

(प्रभु से मिलन के सन्दर्भ में हैं ये पंक्तियाँ)

लोग जिन्दगी की दुआ करते हैं, मेरे लिए ये तुझसे दूर रहने की घड़ी है
मौत तो आनी है, आएगी ही, जल्द आये क्योंकि मुझे वस्ल की पड़ी है |

-विशाल

मुझे साहिल का कोई ख्वाब नहीं, मैं तूफानों का हूँ खूगर,
ले चल मांझी मंझधार में तू, मेरे डूबने की परवाह न कर |

-विशाल

यूँ तो तमाम ग़मों का घर है ये दिल, पर मन में ये ख़ुशी तो है,
कि जो मांगी नहीं कभी किसी से, होठों पर मेरे ऐसी हँसी तो है |

-विशाल

आरजू, उम्मीदें, ख्वाब और अरमान सब सीने में दफ़न हैं,
कहने को हम जिन्दा सही पर क्या किसी मजार से कम हैं |

 -विशाल

सम्मानित शिक्षकों के लिए-----

सलीके से संवारो तो एक पत्थर भी संवर सकता है,
तुम्हारे हाथों में तो तकदीर ने मासूम फ़रिश्ते सौंपे हैं |

-विशाल

नाखुदाओं के भरोसे भी कितनों को डूबते देखा है
आ चल खुद चप्पू चलाकर दरिया पार करते हैं |
मर भी गए तो बेहतर है ये डर डर के यूँ जीने से,
वैसे भी तो रोज ज़माने में न जाने कितने मरते हैं |

-विशाल

गम न होता मुझे अगर वो लूट ले जाते केवल मेरा नशेमन,
कैसे चुप बैठूं मैं जब लुटा जा रहा हो सारा का सारा गुलशन |

-विशाल

अपनी तमाम खुशियाँ बेचकर भी मैं तुम्हारे गम खरीद लूँगा,
जहाँ दुनिया निगाह फेर लेगी, उसी मोड़ पर तुमको मैं मिलूँगा |

-विशाल

यूँ तो हजारों आशियाँ हैं चमन में, पर बिजलियाँ मेरे ही आशियाने पर क्यों गिरी हैं हर बार
जिसने जो चाहा उसे मिल गया, फिर मेरे ही नसीब में क्यों लिखा है इन्तजार औ इन्तजार|

-विशाल

उसकी यादें, उसके अफ़साने, उसकी तमन्ना और उसका गम
यही काफी है जीने को, इसके सिवा कुछ चाहते ही कहाँ हैं हम |

-विशाल

चार कन्धों पर हो के सवार जब भी कोई जाता है,
कुछ अन्दर टूटता है, मन अवसाद से भर जाता है |
वैसे तो मेरा और जाने वाले का कोई रिश्ता नहीं,
पर है तो वो भी माँ, बाप, भाई, बेटा, पति, पत्नी ही कोई |

-विशाल

आज सच बोलेगा अगर तू तो नियति तेरी अभिमन्यु है,
कौरव अट्टहास ही करेंगे क्योंकि अब कहाँ कोई कृष्ण है |

- विशाल

क्यों मेरे ही दर पर खड़ा हो जाता है आ के हर इम्तिहाँ,
ऐसा लगता है किसी ने जान कर दे दिया हो मेरा पता |

-विशाल

वो पूछते हैं कि परेशां हाल थे तो भी तुमने क्यों पुकारा नहीं हमें,
क्या बताएं उन्हें कि डूबते हुये भी तिनके का एहसान गवारा नहीं हमें |

-विशाल

हम कहीं भी हों बना लेंगे जगह अपने लिए, फिर भला क्योंकर करें गम
और कुछ आये ना आये पर, दिल में उतर जाना बखूबी जानते हैं हम |

-विशाल

 पाँव जख्मी हैं मेरे और रहबरों की भी कुछ खबर नहीं,
फिर भी ख्वाहिश है चलने की, मंजिल बुलाती है मुझे |

-विशाल

पत्थरों की ठोकर से मुसाफिर तू क्यों घबराता है,
कई बार इनसे ही मंजिल का पता मिल जाता है |

-विशाल

एक से लगते हैं यहाँ पर सब, कौन है अपना कौन पराया,
कैसे पहचाने, हर शख्स तो यहाँ नकाब पहन कर है आया |

 - विशाल

मुद्दतों से है मुझे एक इन्सां की तलाश पर,
कोई चेहरा ना मिला, बस नकाब ही मिले |

-विशाल

गर खुदा साथ है कोई सफीना डूबा नहीं सकता,
वरना साहिल पर भी नाखुदा बचा नहीं सकता |

-विशाल