Monday, 23 January 2012

ये सोच खुद अपने ज़ख्म उधेड़ कर रख दिए मैंने,
कि वो इन पर मुस्कुराहटों का मलहम लगाएगी,
अभी तो मेरे हिस्से नफरत के सिवा कुछ भी नहीं,
पर किसी दिन तो वो मेरे लिए भी मुस्कुराएगी...
देखे थे जो ख्वाब कभी, अभी भी आते हैं
पर ना जाने क्यों, अब मुझे ये डराते हैं,
दुनियावालों के दिल का कुछ पता नहीं चलता,
"चिराग" कभी जलाते कभी बुझाते हैं,
मै दुश्मनों से शिकायत करूँ भी तो कैसे,
जब मेरे ये दोस्त ही, हर घड़ी मुझे आजमाते हैं....

-विशाल...

Wednesday, 4 January 2012

वो मदहोश था दुनिया की बहारों में कुछ यूँ,
कि उसको कभी मेरा ख़याल आया ही नहीं,
हम देखते रहे पीछे मुड़-मुड़ दूर तलक,
उसने तब भी हमें वापस बुलाया ही नहीं...

-विशाल.....

रोज़ मिलते रहे पर मुलाक़ात ना हो पायी,
कहने को था बहुत कुछ, पर बात ना हो पाई,
यूँ तो वादा था उसका, हमेशा साथ चलने का,
कुछ मजबूरियाँ रही होंगी, जो साथ ना हो पाई...

-विशाल...
 उसका जाना ज़िन्दगी को उदास कर गया
वो मौसम की तरह था, कब का गुज़र गया
मै समझा ही नहीं कि ये क्या हुआ मेरे साथ,
कहने को तो ज़िंदा हूँ, पर कब का मर गया...

-विशाल...
ज़ख्म खा कर भी उसे दुआ दी मैंने
कुछ ऐसे ही ज़िन्दगी बिता दी मैंने
मै ही था मुंसिफ खुद पर इल्जामो का,
खुद को हर बार इसीलिए सज़ा दी मैंने....

-विशाल...