ना हो परिंदों का ठिकाना, वो कोई शजर है क्या,
जिसमें अपनापन ना हो, वो मकाँ घर है क्या?
अरसा बीत गया, उसे महफ़िल से रुखसत हुए,
कोई बताये तो जरा, उसकी कोई खबर है क्या?
उसका हौसला देख आकाश भी सर झुका लेता है,
परवाज देख उसकी, ये ना पूछ कि पर है क्या?
रस्ते में उसका साथ न हो, हाथों में हाथ ना हो,
मंजिल मिल भी जाये पर ये कोई सफ़र है क्या?
मेरे दिल तक तो तेरी हर आहट की खबर आती है,
तेरे दिल तक भी मेरे ख़्वाबों की डगर है क्या?
-विशाल
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