जो कभी ना पूरे होंगे, वो ख्वाब सजाता क्यों है
अपने आप को इस तरह से बहलाता क्यों है |
तेरे जख्मों की खबर शायद किसी को नहीं,
फिर चोट खाकर तू हमेशा मुस्कराता क्यों है |
वो आकर लौट जाता है कुछ कहे बिना चुपचाप,
मैं समझता ही नहीं, फिर वो यहाँ आता क्यों है|
तेरे दर पर ये बड़ी उम्मीद से आये होंगे,
बेबात इन परिंदों को इस तरह से उडाता क्यों है |
तेरी दिल में क्या है, ये तू ही जाने है मौला,
कश्ती कभी डुबाता तो कभी उतराता क्यों है |
गर मिटा दिया है अपनी यादों से उसको तूने,
फिर उसके नाम का 'चिराग' जलाता क्यों है |
-विशाल

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