क्या था मेरा गुनाह जो सजा मिली मुझको,
रात और दिन ये सवाल मुझको सताएगा |जानता हूँ कि वो भी भुला नहीं पायेगा मुझको,
बार बार लिखेगा मेरा नाम और फिर मिटाएगा |
जिक्र मेरा कभी करे, ना करे अपनी बातों में,
पर मेरा ख्याल तो उसे भी बार बार आएगा |
क्या सच में अब मुझसे दूर चला जाएगा वो,
दिल तो कहता है कि लौट के फिर से आएगा |
इसी उम्मीद पर अब तलक जिन्दा हूँ मैं, वरना
साथ गुजारा था जो वक़्त बहुत तड़पायेगा |
जिस तरह टूट कर चाहा था उसने मुझको,
कौन भला अब उस शिद्दत से मुझे चाहेगा |
कल को जब रुखसत हो जाऊंगा इस जहाँ से,
कौन बैठा है यहाँ जो मेरे लिए अश्क बहायेगा |
इन ग़मों को कब तक अपने सीने में पालेगा,
जो तू हँसेगा तो फिर जमाना भी मुस्कराएगा |
अंधेरों से लड़ना तो अपना शगल रहा है 'चिराग',
दुनिया को रोशन करने खुद ही को जलाएगा |
-विशाल
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