जिसने मेरे पाँव को लहुलुहान किया है,
मेरे ही जूते की कील थी, कोई काँटा नहीं,
गैरों से कैसा शिकवा, गम में साथ न आने का,
जो अपने थे उन तक ने तो कभी बाँटा नहीं...
- विशाल...
मेरे ही जूते की कील थी, कोई काँटा नहीं,
गैरों से कैसा शिकवा, गम में साथ न आने का,
जो अपने थे उन तक ने तो कभी बाँटा नहीं...
- विशाल...
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