Tuesday, 20 December 2011

 गर दूर तक साथ निभा सको तो चलो...
चोट खा के भी मुस्कुरा सको तो चलो...
मुसव्वर नहीं तुम मुझे भी मालूम है,
दिल में मेरी तस्वीर बना सको तो चलो...
चाँद ना बन सको तो जुगनू ही सही,
ज़िन्दगी में थोड़ी ताबानी ला सको तो चलो...
अँधेरी राहों का मुसाफिर हूँ मै भटकता हुआ,
"चिराग" हर मोड़ पर जला सको तो चलो...
गर दूर तक साथ निभा सको तो चलो...
चोट खा के भी मुस्कुरा सको तो चलो...

- विशाल....

 
 

2 comments:

  1. विशाल जी,
    मुझे नहीं मालूम था आप इतना बेहतरीन लिखते हैं, आपके ब्लॉग की हर रचना बेहद खूबसूरत है.....यूँ ही लिखते रहा कीजिये... शुभकामनाएं......

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  2. great job....wat to say....keep it up...my wishes for u...aap issi tarah likhte rahe ...

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