सब में आदमी को पहचानने का सलीका नहीं होता,
माथे के चन्दन को उसने पाँव में रखा...
उसका मेरा नाता रहा कुछ इस तरह,
दूर रह कर भी उसने अपनी निगाहों में रखा...
उसकी ज़िन्दगी में कोई जगह ना थी मेरी,
मैंने उसे हर वक़्त अपनी दुआओं में रखा...
मुश्किलों से लड़ना अपना शगल रहा है दोस्त,
"चिराग" को मैंने हमेशा हवाओं में रखा.....
- विशाल....
माथे के चन्दन को उसने पाँव में रखा...
उसका मेरा नाता रहा कुछ इस तरह,
दूर रह कर भी उसने अपनी निगाहों में रखा...
उसकी ज़िन्दगी में कोई जगह ना थी मेरी,
मैंने उसे हर वक़्त अपनी दुआओं में रखा...
मुश्किलों से लड़ना अपना शगल रहा है दोस्त,
"चिराग" को मैंने हमेशा हवाओं में रखा.....
- विशाल....
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