Tuesday, 20 December 2011

मृत्यु सत्य है अंतिम, उसको तो है आना,
फिर चिंता में राही, काहे का घबराना,
चिंता तू कर इसकी कि मृत्यु तेरी हो कैसी,
अगणित जाते हैं जैसे या आज़ाद, भगत  सिंह जैसी...
ना करना पड़े विचार तुझे ये अंतिम क्षण पर,
कि क्यों आया था यहाँ, जा रहा क्यों कर....!
मन में हो संतोष कि जीवन जी भर जिए,
जब दी गयी पुकार, छोड़ सब चल दिए...
स्मृति में रहे तू युगों तक इस धरती पर,
इस शरीर का क्या, चोला माटी का नश्वर...
बन प्रकाश स्तम्भ तू इस तिमिर घटा में,
हो आलोकित पथ सबका बढ़ते जाएँ,
मृत्यु तेरी बन जाए असंख्यों का जीवन,
उद्देश्यों के हेतु करें हम सर्वस्व समर्पण....

-विशाल....

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