Saturday, 28 July 2012

आज फिर से गुजरा जमाना याद आया,
एक भूला बिसरा सा तराना याद आया |
घर की मुंडेर पर बैठी चिड़ियाँ याद आयीं,
और उनका चहचहाना याद आया|
एक पत्थर से ही तोड़ लेते थे आम हम अमराई में,
फिर से अपना वो निशाना याद आया|
कुछ कह पाने की हिम्मत जुटाना मुश्किल था,
बहानों से उसके घर आना जाना याद आया|
पापा की घूरती आँखों से बचाने के लिए,
माँ का झट से आँचल में छुपाना याद आया|
आज जब फुर्सत में बैठे सोचने कुछ एक पल,
ना जाने क्यों वो बचपन सुहाना याद आया|
इस नयी दुनिया के नए रंगों से वाकिफ नहीं हम,
इसीलिए शायद आज सब कुछ पुराना याद आया|
--------------------विशाल

No comments:

Post a Comment